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Home/देश/दहेज प्रताड़ना को ‘घरेलू विवाद’ समझकर न करें नजरअंदाज, बेटी की शिकायत मदद की पुकार हो सकती है: इलाहाबाद हाईकोर्ट 
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दहेज प्रताड़ना को ‘घरेलू विवाद’ समझकर न करें नजरअंदाज, बेटी की शिकायत मदद की पुकार हो सकती है: इलाहाबाद हाईकोर्ट 

By joharjharkhandliveinfo@gmail.com
August 4, 2026

News Wave Desk: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने दहेज हत्या से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान परिवार और समाज की जिम्मेदारी को लेकर बेहद अहम टिप्पणी की है. कोर्ट ने कहा कि अगर कोई विवाहित महिला बार-बार मायके लौटकर ससुराल में प्रताड़ना की शिकायत करती है, तो उसकी बात को सामान्य वैवाहिक कलह मानकर टालना गंभीर भूल हो सकती है. ऐसी शिकायत कई बार सुरक्षा और मदद के लिए महिला की आखिरी पुकार होती है.

Contents
  • बेटी की शिकायत पर परिवार तुरंत करे कार्रवाई
  • समय पर हस्तक्षेप होता तो बच सकती थी जान
  • दहेज के खिलाफ सिर्फ अदालत नहीं, समाज को भी लड़ना होगा
  • उम्रकैद की सजा में हाईकोर्ट ने किया बदलाव
  • मीना ने मौत से पहले मायके वालों को बताई थी परेशानी

बेटी की शिकायत पर परिवार तुरंत करे कार्रवाई

न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने श्रावस्ती के वर्ष 2011 के दहेज हत्या मामले में दाखिल अपील पर फैसला सुनाते हुए यह टिप्पणी की. कोर्ट ने कहा कि परिवार की नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी है कि वह अपनी बेटी की शिकायत को गंभीरता से सुने और उसकी सुरक्षा, सम्मान तथा जीवन की रक्षा के लिए समय रहते जरूरी कदम उठाए. अदालत ने कहा कि दहेज उत्पीड़न का सामना कर रही महिलाओं को अक्सर मायके से ‘समझौता कर लो’, ‘थोड़ा एडजस्ट कर लो’ या ‘घर बचाने की कोशिश करो’ जैसी सलाह मिलती है. ऐसी सलाह कई बार पीड़िता को उसी माहौल में वापस जाने के लिए मजबूर कर देती है, जहां उसका उत्पीड़न हो रहा होता है. इससे आरोपी पक्ष का मनोबल भी बढ़ सकता है.

समय पर हस्तक्षेप होता तो बच सकती थी जान

कोर्ट ने इस मामले को उदाहरण बताते हुए कहा कि यदि पीड़िता की शिकायत को गंभीरता से लेते हुए समय रहते हस्तक्षेप किया जाता, तो संभव है कि उसकी जान बचाई जा सकती थी. अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी महिला की परेशानी को तब तक नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए, जब तक मामला गंभीर आपराधिक घटना का रूप ले ले.

Read Also: गुमला: राष्ट्रीय राजमार्ग-143 की बदहाल सड़क बनी परेशानी का सबब, गड्ढों से हादसों का बढ़ा खतरा

दहेज के खिलाफ सिर्फ अदालत नहीं, समाज को भी लड़ना होगा

हाईकोर्ट ने कहा कि दोषियों को कानून के तहत सजा दिलाना जरूरी है, लेकिन न्यायिक कार्रवाई उस शुरुआती हस्तक्षेप की जगह नहीं ले सकती, जो किसी महिला की जान बचा सकता है. दहेज जैसी सामाजिक बुराई को खत्म करने के लिए परिवार, रिश्तेदार, समुदाय और पूरे समाज को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी. अदालत ने कहा कि किसी महिला को चुपचाप प्रताड़ना सहने के लिए मजबूर करने के बजाय उसकी हर शिकायत को गंभीरता से सुना जाना चाहिए और समस्या का समय रहते समाधान तलाशना चाहिए. कोर्ट ने भावनात्मक टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालत का कोई भी फैसला किसी ऐसी जिंदगी को वापस नहीं ला सकता, जो समय पर मदद न मिलने के कारण खो गई हो. इसलिए किसी बेटी की मदद की पुकार को त्रासदी में बदलने से पहले सुनना जरूरी है.

उम्रकैद की सजा में हाईकोर्ट ने किया बदलाव

मामले में हाईकोर्ट ने मृतका के पति दिनेश कुमार और परिवार के अन्य सदस्यों शेषराज, ननबाबू, बड़े लाल कोरी और बिट्टा देवी की दहेज हत्या, उत्पीड़न और दहेज की मांग से जुड़े आरोपों में दोषसिद्धि बरकरार रखी. हालांकि, अदालत ने ट्रायल कोर्ट की ओर से सुनाई गई उम्रकैद की सजा में संशोधन करते हुए इसे अभियुक्तों द्वारा जेल में बिताई जा चुकी अवधि में बदल दिया. जेल मैनुअल के अनुसार गणना करने पर पति दिनेश कुमार और देवर शेषराज 17 साल से अधिक समय जेल में रह चुके हैं. वहीं ननबाबू ने 14 साल से अधिक, ससुर बड़े लाल ने करीब 13 साल और बिट्टा देवी ने लगभग नौ साल जेल में बिताए हैं.

मीना ने मौत से पहले मायके वालों को बताई थी परेशानी

अदालत के सामने आए तथ्यों के मुताबिक, मृतका मीना देवी ने ससुराल में दहेज को लेकर हो रहे उत्पीड़न की जानकारी अपनी भाभी, भाई और मां को दी थी. घटना से करीब आठ से दस दिन पहले भी मीना ने फोन पर रोते हुए मायके वालों को बताया था कि ससुराल पक्ष एक लाख रुपये और मोटरसाइकिल की मांग कर रहा है. मीना के मुताबिक, मांग पूरी नहीं होने पर उसे और उसकी मां को जान से मारने की धमकी भी दी जा रही थी. इसके बावजूद परिवार की ओर से उसे कुछ समय तक परिस्थितियों से समझौता करने और मामला संभालने की सलाह दी गई. हाईकोर्ट की टिप्पणी इसी पहलू को लेकर बेहद महत्वपूर्ण रही. अदालत ने संकेत दिया कि घरेलू विवाद समझकर किसी महिला की लगातार शिकायतों को नजरअंदाज करना कभी-कभी बेहद घातक साबित हो सकता है. परिवार को चाहिए कि वह बेटी की बात सुने, स्थिति की गंभीरता को समझे और जरूरत पड़ने पर समय रहते उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करे.

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