Ravi Bharti
Ranchi: झारखंड की लाल माटी, यहां के सघन वन, कल-कल करती नदियां और इन सबके बीच बसर करने वाले आदिवासी समाज की आत्मा में जो एक नाम गूंजता है, वह है दिशोम गुरु शिबू सोरेन. महज 13 वर्ष की कच्ची उम्र में जब सिर से पिता का साया छिन गया, तो उस बालक की आंखों से बहे आंसुओं ने बदला नहीं, बल्कि एक ऐसा जन-क्रांति का शोला बनकर भड़का, जिसने आगे चलकर एक पूरे राज्य की नींव रख दी. वर्ष 2025 में 81 वर्ष की आयु में जब इस महायोद्धा ने अपनी अंतिम सांसें लीं, तो लगा मानो झारखंड के पहाड़ों ने अपना सबसे बड़ा रक्षक और जंगलों ने अपनी आत्मा को खो दिया हो. हाल ही में राष्ट्रपति भवन में उन्हें देश के प्रतिष्ठित सम्मान ‘पद्मभूषण’ से नवाजा गया. यह अलंकरण केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं है, बल्कि उस वंचित, शोषित और आदिवासी समाज की तपस्या को राष्ट्र की श्रद्धांजलि है, जिसके लिए गुरुजी ने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया.
- नेमरा की वह काली रात: जब 13 साल के बालक ने उठाई महाजनों के खिलाफ हुंकार
- संथाल की माटी और ‘दिशोम गुरु’ का अभ्युदय
- झामुमो (जेएमएम) का शंखनाद
- सड़क से संसद तक: अलग झारखंड राज्य का ऐतिहासिक स्वप्न
- सत्ता के शिखर पर और संसदीय राजनीति के अजेय सुल्तान
- संसदीय राजनीति का बेताज बादशाह
- पद्मभूषण सम्मान: एक योद्धा को राष्ट्र का सर्वोच्च सलाम
नेमरा की वह काली रात: जब 13 साल के बालक ने उठाई महाजनों के खिलाफ हुंकार
11 जनवरी 1944 को रामगढ़ जिले के छोटे से गांव नेमरा में सोबरन सोरेन के घर जन्मे शिबू सोरेन का बचपन बेहद साधारण था. सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन झारखंड के आदिवासियों का खून चूसने वाली महाजनी प्रथा और सूदखोरों के जुल्म ने उनकी दुनिया उजाड़ दी. गरीबों और आदिवासियों को महाजनों के चंगुल से बचाने की आवाज उठाने के कारण उनके पिता सोबरन सोरेन की बेरहमी से हत्या कर दी गई. महज 13 साल की उम्र में जब बच्चे खिलौनों और सपनों की दुनिया में जीते हैं, शिबू सोरेन पिता के शव के सामने खड़े थे. उस वक्त उनकी आंखों में आंसू के साथ-साथ एक दृढ़ संकल्प था—शोषकों के इस साम्राज्य को जड़ से उखाड़ फेंकने का.इस वीभत्स घटना ने उनके जीवन की दिशा को पूरी तरह बदल दिया। उन्होंने गांव-गांव घूमकर आदिवासियों और वंचितों को संगठित करना शुरू किया. उनका यह जन-आंदोलन इतना प्रभावी साबित हुआ कि महाजन बैकफुट पर आ गए और गरीबों को उनकी छीनी हुई जमीनें वापस मिलने लगीं। यहीं से एक साधारण युवा ‘गुरुजी’ के रूप में उभरकर सामने आया.

संथाल की माटी और ‘दिशोम गुरु’ का अभ्युदय
शिबू सोरेन के व्यक्तित्व का असली विस्तार तब हुआ जब उनका कारवां संथाल परगना के जंगलों और पहाड़ों तक पहुंचा. वहां के मूलवासियों ने उन्हें केवल एक नेता नहीं, बल्कि अपना भगवान और अपना सर्वोच्च संरक्षक मान लिया। यहीं से उन्हें दिशोम गुरु (यानी देश का गुरु) की उपाधि मिली, जो ताउम्र उनके नाम के साथ अटूट रूप से जुड़ी रही.

झामुमो (जेएमएम) का शंखनाद
1970 के दशक में जब आदिवासियों की आवाज को कुचलने का प्रयास किया जा रहा था, तब शिबू सोरेन ने ‘झारखंड मुक्ति मोर्चा’ (झामुमो) की स्थापना की. यह सिर्फ एक राजनीतिक दल का गठन नहीं था, बल्कि शोषितों और वनवासियों की अस्मिता की लड़ाई का शंखनाद था.गुरुजी का व्यक्तित्व ऐसा था कि उनके एक इशारे पर जंगलों से हजारों की संख्या में आदिवासी तीर-धनुष लेकर सड़कों पर उतर आते थे। उनकी यह ताकत इतनी मुखर थी कि सत्ता के गलियारों में बैठे लोग भी हिल जाते थे.

सड़क से संसद तक: अलग झारखंड राज्य का ऐतिहासिक स्वप्न
आज हम जिस स्वतंत्र, प्रगतिशील और समृद्ध झारखंड में सांस ले रहे हैं, उसकी हर ईंट के नीचे दिशोम गुरु के पैरों के छाले और उनके अनगिनत समर्थकों का खून-पसीना शामिल है.गुरुजी ने इस आंदोलन को केवल जंगलों और गांवों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने इसे ‘सड़क से संसद’ तक पहुंचाया. दिल्ली के सत्ता के गलियारों में जब तक झारखंड की सुलगती आग और अलग राज्य की मांग नहीं गूंजी, तब तक वे चैन से नहीं बैठे. उनके इसी अथक संघर्ष का परिणाम था कि साल 2000 में बिहार से कटकर एक अलग झारखंड राज्य का वजूद सामने आया.

सत्ता के शिखर पर और संसदीय राजनीति के अजेय सुल्तान
झारखंड के गठन के बाद भी उनका सफर थमा नहीं. उन्होंने राज्य और केंद्र दोनों ही स्तरों पर अपनी अमिट छाप छोड़ी.शिबू सोरेन अपने राजनीतिक जीवन में तीन बार (2005, 2008 और 2009-10) झारखंड के मुख्यमंत्री बने. गठबंधन की जटिलताओं के कारण उनके कार्यकाल लंबे नहीं टिके, लेकिन वे जब भी सत्ता में रहे, उनकी नीतियां हमेशा सूबे के अंतिम पायदान पर खड़े गरीब, किसान और मजदूरों के हित में रहीं.

संसदीय राजनीति का बेताज बादशाह
दुमका लोकसभा सीट से 8 बार सांसद चुना जाना इस बात का प्रमाण है कि जनता के दिलों में उनकी जड़ें कितनी गहरी थीं. इसके अलावा, उन्होंने राज्यसभा की सदस्यता भी निभाई और केंद्र सरकार में कोयला मंत्री जैसे महत्वपूर्ण महकमे को संभालते हुए प्रशासनिक दक्षता का परिचय दिया.ग्राम पंचायत की धूल भरी चौपाल से लेकर देश की सबसे बड़ी पंचायत (संसद) तक, उनकी दहाड़ हमेशा आदिवासियों और गरीबों की सबसे मजबूत ढाल बनकर गूंजी.

पद्मभूषण सम्मान: एक योद्धा को राष्ट्र का सर्वोच्च सलाम
वर्ष 2025 में जब उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा, तो पूरा झारखंड शोक में डूब गया था. लेकिन हाल ही में राष्ट्रपति भवन में जब उन्हें मरणोपरांत ‘पद्मभूषण’ से सम्मानित किया गया, तो ऐसा महसूस हुआ मानो भारत के लोकतंत्र ने अपने एक सबसे निर्भीक, बेबाक और स्वाभिमानी सपूत को उसका सच्चा हक दिया है.उन्होंने अपने पूरे राजनीतिक जीवन में कभी भी व्यक्तिगत नफे-नुकसान के लिए अपने समाज के हितों से समझौता नहीं किया। आज भले ही दिशोम गुरु भौतिक रूप से हमारे बीच मौजूद नहीं हैं, लेकिन ‘पद्मभूषण’ की यह चमक आने वाली हर पीढ़ी को यह सिखाती रहेगी कि अधिकारों के लिए कैसे डटकर संघर्ष किया जाता है. जल, जंगल और जमीन की रक्षा का इतिहास जब भी लिखा जाएगा, शिबू सोरेन का नाम उसमें सबसे स्वर्णिम अक्षरों में चमकता रहेगा.